भैया दूज कब है? 2022 में और इसको क्यों मनाया जाता है, जाने विस्तार से।

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भैया दूज कब है 2022 में।

भैया दूज 2022 में 26 अक्टूबर दिन बुधवार को है। भैया दूज का हिंदू धर्म में क्या महत्व है और यह क्यों मनाया जाता है यह संपूर्ण जानकारी हम आपको अपने इस आर्टिकल के माध्यम से उपलब्ध कराने वाले हैं। भैया दूज क्या है यह क्यों मनाया जाता है इन सब सवालों का जवाब आपको इसी लेख में मिलने वाला है। तो चलिए अब हम बात करते हैं, भैया दूज के बारे में।

हिंदू धर्म में दीपावली हिंदुओं के सबसे प्रमुख त्योहारों में से एक है। दीपावली पांच दिवसीय त्योहार के रूप में मनाई जाती है। हिंदू धर्म में दीपावली का त्यौहार पांच दिवसीय त्योहारों में जाना जाता है।


 और इस 5 दिन के त्यौहार में भैया दूज दीपावली के पांचवें दिन मनाया जाता है। भैया दूज के त्यौहार को यम द्वितीया तोहार भी कहा जाता है। हिंदू धर्म में भैया दूज का त्यौहार  भाई बहन के रिश्ते पर आधारित पर्व है। जिसको बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। हिंदू धर्म में रक्षाबंधन के बाद दीपावली दूजा ऐसा त्यौहार है जो भाई बहन के प्यार को या प्रेम को दर्शाता है।


भैया दूज का त्यौहार 6 नवंबर दिन शनिवार 2021 को मनाया जाएगा। भैया दूज का मनाने का शुभ मुहूर्त प्रात 7:45 से शुरू होगा और शाम 5:00 बज कर 43 मिनट पर खत्म होगा।


हमारी भारतीय संस्कृति में दीपावली का त्यौहार पांच दिवसीय त्योहारों के रूप में मनाया जाता है।  भैया दूज का पर्व हिंदू धर्म में गोवर्धन पूजा के अगले दिन मनाया जाता है। इस दिन विवाहिता बहने अपने भाई को भोजन के लिए आमंत्रित करती हैं। और गोबर से भैया दूज पर्व का निर्माण कर बहने पूजा अर्चना करके अपने भाई को प्रेम पूर्वक भोजन कराती हैं। बहन अपने भाई को तिलक लगाकर और उपहार देकर अपने भाई की लंबी उम्र की कामना करती है। भैया दूज से जुड़ी कुछ मान्यताएं हैं जिसके कारण यह अलग-अलग शहरों में अलग अलग तरीके से मनाया जाता है।


भैया दूज के लिए प्राचीन मान्यता 

सूर्य देव की पत्नी छाया की कोख से 2 बच्चों ने जन्म लिया।  जिसमें 1 बच्चे का नाम यमराज और दूसरे बच्चे का नाम यमुना था। जब दोनों बहन भाई बड़े हो गए और यमुना पराए घर की हो गई। तब अपने भाई यमराज से बहुत प्यार और नम्रता के साथ विनती करती थी। कि भैया एक बार मेरे घर आकर जरूर भोजन कर ले।


 लेकिन यमराज काम में इतने व्यस्त थे की बहन के बार बार कहने पर भी उसके घर भोजन के लिए जा ना सके। एक दिन कार्तिक शुक्ल द्वितीया को जब यमुना ने अपना दरवाजा खोला तो यमराज को वहां खड़ा पाया। यमराज को अपने गेट पर यमुना देखकर बहुत ज्यादा प्रसन्न हुई। 


अपने भाई यमराज का स्वागत सत्कार किया और भोजन कराया। यमुना से प्रसन्न होकर यमराज ने उससे वर मांगने को कहा। इस पर बहन ने भाई यमराज से कहा कि भाई प्रतिवर्ष आप मेरे यहां भोजन के लिए आ जाया करना। और इस दिन जो बहन अपने भाई को तिलक कर भोज कराएगी 


उसे आप का भय ना रहे। यमराज तथास्तु कहकर यमपुरी चले गये। इसलिए ऐसी मान्यता है कि आज के दिन जो भाई यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आदित्य को स्वीकार करते हैं। 


उन्हें और उनकी बहन को यमराज का भय नहीं रहता। इससे यह पता चलता है कि भैया दूज पर बहन है अपने भाई के लिए लंबी उम्र की कामना करती है।


भैया दूज के लिए एक और मान्यता

भैया दूज को लेकर यह मान्यता है की इस दिन भाई को तिलक लगाकर प्रेम और स्नेह से भाई को भोजन कराने से भाई-बहन के आपसी संबंध तो अच्छे होते हैं। 


मान्यता है कि भाई की उम्र भी लंबी होती है। क्योंकि आज के दिन कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन यमुना ने अपने भाई यमराज को खाना खिलाया था और वचन लिया था कि आज के दिन जो बहन अपने भाई के तिलक कर भोजन करआएगी तो दोनों भाई बहन को यमराज का भय ना हो गा।


 इसलिए भैया दूज मनाने से भाई की उम्र लंबी और बहन के सौभाग्य में वृद्धि होती है। इस बार भैया दूज का पर्व 6 नवंबर दिन शनिवार 2021 को मनाया जाएगा बहन अपने भाई को तिलक लगाकर इस दिन भोजन  कराएगी।


भैया दूज से सीख

भैया दूज हिंदू धर्म में एक ऐसा पर्व है। जिससे कि हमें एक ऐसी सीख मिलती है। क्योंकि भाई का प्रेम है सबसे अलग जो बहन के प्रति बचपन से ही चिंतित रहने वाले भाई को बहन के लिए अपना प्रेम प्रकट करने का अच्छा मौका मिलता है। भैया दूज के पर्व को भी रक्षाबंधन के त्यौहार के तरह मान्यता होनी चाहिए।


 हिंदू धर्म में भैया दूज को इतनी मान्यता नहीं दी गई जितनी की रक्षा बंधन को दी जाती है। बहन को चाहिए की भैया दूज के पर्व पर अपने भाई को बुलाकर तिलक लगाकर भोज कराना चाहिए और भाई की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। 


और  साथ मे  भोज कराने के साथ-साथ भाई को एक छोटा सा उपहार देना चाहिए। इस पर्व से भाई बहन दोनों में प्यार और उम्र कर आएगा। हिंदू धर्म में भैया दूज के त्योहार से सभी हिंदू भाइयों को एक सीख लेनी चाहिए और इसे रक्षाबंधन के त्यौहार की तरह ही मान्यता दी जानी चाहिए।

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