Ramadan 2023:-इस वर्ष 2023 में रोजे 3 अप्रैल दिन इतवार से शुरू है। भारत देश में रोजे मुसलमान भाइयों के साथ साथ अन्य जाति के लोग भी रोजों को अपने अपने धर्म के अनुसार रखते हैं। लेकिन रोजे रखने का उनका अंदाज और धर्म के मुताबिक नाम अलग-अलग है। हिंदू धर्म में उपवास के नाम से रोजे को रखा जाता है ठीक इसके विपरीत मुस्लिम धर्म में उपवास को रोजो के नाम से जाना जाता है। आगे जानते हैं कि मुस्लिम धर्म में रोजे की शुरुआत कैसे और कब से शुरू हुई।इसके बारे में हम आपको बहुत ही सटीक जानकारी उपलब्ध कराएंगे अपने इस आर्टिकल (लेख) के माध्यम से।

रोजे 2023 में कब से हैं


2023 में इस साल रोजे 3 अप्रैल से शुरू हो रहे हैं। मुसलमानों के लिए रोजा रखना सुन्नत है। रोजे रखना और नमाज और तराबीह पढ़ना हर मुसलमान के लिए फर्ज है। इस वर्ष 2023 में रोजे 3 अप्रैल 2023 से शुरू है। प्यारे मुसलमान भाई रमजान के महीने में रोजे रखकर और नमाज व तरावीह पढ़कर अल्लाह अल्लाह में वक्त गुजारते हैं।

रमजान के महीने में मुसलमान रोजे रखते हैं।और तराबीह पढ़ते हैं। ऐसा करने से उनकी रूह पाक साफ होती है,और उनका ईमान ताजा हो जाता है।

रोजा रखने के लिए रोजदार को फज्र की नमाज से पहले कुछ खाना पड़ता है। और फजर की नमाज से पहले कुछ खा कर मुसलमान रोजा रखता है,और पांच वक्त की नमाज अदा करता है।

रोजा क्यों रखा जाता है।

भारत में इस साल 2023 मैं रोजे की शुरुआत 3 अप्रैल दिन इतवार से है। रमजान के इस पाक महीने में रोजे रखे जाते हैं। रोजे रखने के दौरान मुसलमान सूरज निकलने से पहले खाना खा लेते हैं, और दिन भर ना खाते हैं ना पीते हैं। मगरिब की अजान पर मुसलमान भाई रोजे को अफ्तार (रोजा खोल ना)करते हैं।

रोजा रखने के दौरान मुसलमान भाई पांच वक्त की नमाज अदा करते हैं, और मस्जिद में इमाम के पीछे तराबीह पढ़ते हैं। पांच वक्त की नमाज पढ़ने के लिए मुसलमान वुजू करते हैं, दिन में 5 बार वुजू करने से उनके चेहरे पर नूर आता है। यानी कि उनका चेहरा बहुत खूबसूरत नजर आता है। अल्लाह रब्बुल इज्जत से यही दुआ है, कि हर मोमिन को रोजा रखने और नमाज पढ़ने की तौफीक अता फरमाए।..…............... आमीन।

रोजे की शुरुआत कैसे हुई।

इस्लाम धर्म में रोजा रखने व रमजान के महीने की शुरुआत दूसरी हिजरी में हुई। जो आज 14 सौ साल के बाद भी जारी है। इस्लाम धर्म के मानने वाले हर वाली व्यक्ति पर रोजा फर्ज है। चाहे वह किसी भी उम्र का हो जैसे बच्चा औरत मर्द बूढ़ा आदि।

रमजान के इस महीने में रोजदार सदका व खैरो जकात निकालता है। ऐसा मानना है कि सदका व खैरों जकात निकालने से बुरी बला और मुसीबत से अल्लाह बचाता है। और इसका सबब हमें आखिरत में पहुंचता है।


रोजा रमजान के पाक महीने में रखा जाता है। यह बढ़ा ही रहमतों और बरकतो वाला महीना है। अल्लाह ताला इस महीने में जन्नत के दरवाजे खोल देता है। रमजान के इस महीने में मरने वाला बिना हक  हिसाब के सीधे जन्नत में जाता है।

रमजान के महीने में रोजा रखने के दौरान सूरज निकलने से सूरज छुपने तक कुछ खाया पिया नहीं जाता है। और रोजे की हालत में बहुत ही खयालात रखना पड़ता है।कि रोजदार अपनी जुबान से ना तो किसी को गलत बोलेगा और ना ही कुछ गलत सुनेगा और ना ही कुछ गलत करेगा,तब उसका रोजा अल्लाह के यहां कुबूल होगा। उपर दी गई शर्तों में से अगर रोजदार कोई शर्त पूरी नहीं करता है।तब उसका रोजा कुबूल नहीं होगा उसका रोजा मुकरू हो जाएगा।

रोजा रखने से क्या होता है।

रोजा रखने से क्या होता है अगर आप ने इंटरनेट पर ऐसा कुछ सर्च किया है तो आप सही पोस्ट पढ़ रहे हैं। आज आप इस पोस्ट को पढ़कर इंटरनेट पर रोजा रखने से क्या होता है सर्च करना बंद कर देंगे। क्योंकि आज आपको हमारी वेबसाइट के इस आर्टिकल को पढ़कर संपूर्ण जानकारी प्राप्त हो जाएगी।

भारत में इस साल 2023 में रोजा 3 अप्रैल दिन बुधवार को रखा जाएगा।

कारी फिरोज आलम अल्वी के अनुसार इस साल रोजा 2023  में 3 अप्रैल दिन बुधवार को रखा जाने की उम्मीद है। क्योंकि मुस्लिम लोग चांद की तारीख के हिसाब से मुस्लिम त्योहारों को मनाते हैं।

जामा मस्जिद रामपुर के इमाम साहब का कहना है कि रमजान का महीना इस्लामिक कैलेंडर में नौवां महीना है। और इसी महीने में मुसलमान रोजा रखते हैं। मुसलमानों के रोजा और नमाज पढ़ने का इस महीने में बहुत ही ज्यादा महत्व है। रमजान अरबी का शब्द और इस्लामी महीना है।

फारसी भाषा में रमजान को उपवास कहते हैं। भारत के मुस्लिम समुदाय के लोगों मैं फारसी भाषा का अधिक प्रभाव होने के कारण उपवास को रमजान कहा जाता है।

इस्लाम धर्म में रोजा रखने की परंपरा दूसरी हिजरी से शुरू हुई है। कलाम ए पाक की दूसरी आयत सूरह अल बकराह मैं साफ तौर से कहा गया है।कि रोजा तुम पर उसी तरह से फर्श किया जाता है जिस तरह से रोजा तुमसे पहले दूसरी उम्मत पर फर्ज था। हजरत मोहम्मद उर रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो ताला अलेही वसल्लम मक्के से हजरत कर मदीना पहुंचे। मोहम्मद साहब के मदीना पहुंचने के बाद 1 साल के बाद हुक्म आया कि रोजे रखो। और तभी से हर मुसलमान रोजे रखता है और पांच वक्त की नमाज अदा करता है। रोजे रखने का सिलसिला तभी से चला रहा है।

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