हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम किस खानदान से ताल्लुक रखते थे।
मेरे प्यारे इस्लामी भाइयों आज आप मेरे इस आर्टिकल में जानेंगे कि हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम किस खानदान से ताल्लुक रखते थे। हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम का किस्सा हिंदी में आपको बखूबी बताया जा रहा है उसको नीचे तक स्क्रॉल करके पूरा पढ़ें।
हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम हजरत याकूब अलैहिस्सलाम के बेटे और हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम के परपोते हैं।
हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम को यह शराफ हासिल है की उनके वालिद नबी, वह खुद नबी और उनके दादा नबी और उनके परदादा हजरत इब्राहिम अब उल अंबिया ( नदियों के बाप ) हैं।
प्यारे इस्लामी भाइयों आज आप समझ गए होंगे क्या हजरत युसूफ अलेह सलाम किस खानदान से ताल्लुक रखते हैं।
हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम का कुरान में 26 बार जिक्र आया है। इनको यह भी फक्र हासिल है की इनके नाम की एक सूर: कुरान में (सूर: युसूफ:) मौजूद है।
जो सबक और नसीहत का बेनज़ीर जखीरा है खजाना है। इसलिए कुरान मजीद में हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम के किस्से को अहसनुल कशस कहा गया है।
हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम का ख्वाब और उनके भाई।
हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम जिंदगी की शुरुआत से ही अपने दूसरे भाइयों से दिमागी और फितरी इस्तेदार से अलग थे। हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम के वालिद हजरत याकूब अलैहिस्सलाम उनकी पेशानी पर चमकता हुआ नूरे नबूवत पहचानते थे। क्योंकि हजरत याकूब अलैहिस्सलाम को अल्लाह की तरफ से भेजी गई वहीं से मालूम हो गया था।
इसी वजह से वे अपनी तमाम औलाद में से हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम से बेइंतहा मोहब्बत करते थे। हजरत याकूब अलेह सलाम की यह मोहब्बत ईश्वर से उनके भाइयों को बेहद शाक और नाकाबिले बर्दाश्त थी।

उनके भाई हर वक्त इस फ़िक्र में लगे रहते थे कि या तो हज़रत याकूब के दिल से इस मुहब्बत को निकाल डालें। और या फिर यूसफ़ ही को अपने रास्ते से हटा दें, ताकि किस्सा ही खत्म हो जाए। इन भाइयों के ख्यालात के हसद को जबरदस्त ठेस उस वक्त लगी, जब यूसफ़ अलैहि सलाम ने एक ख्वाब देखा। ख्बाव यह था कि ग्यारह सितारे और सूरज व चांद उनके सामने सज्दा कर रहे हैं। हजरत याकूब अलैहि सलाम ने यह ख्वाब सुना तो सख्ती के साथ उनको मना कर दिया कि अपना यह ख्वाव किसी के सामने न दोहराना, ऐसा न हो कि ” सुनकर तेरे भाई तेरे साथ बुरी तरह पेश आएं‌। क्योंकि शैतान इंसान के पीछे लगा है। और तेरा ख्वाब अपनी ताबीर में बहुत साफ और वाजेह है, लेकिन हसद की भड़कती हुई आग ने एक दिन यूसुफ के भाइयों को उनके खिलाफ साजिश करने पर मजबूर कर ही दिया।

हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम के भाई उनका कत्ल करने के इरादे से उनको सैर कराने के बहाने ले गए। और मश्विरे के मुताबिक उनको एक ऐसे कुएं में डाल दिया, जिसमें पानी न था। और मुद्दत से सूखा पड़ा था, और वापसी में उनकी कमीज को किसी जानवर के खून में तर करके रोते हुए हजरत याकूब अलैहि सलाम के पास आए और कहने लगे, ‘ऐ बाप! अगर हम आपको  अपनी सच्चाई का कितना ही यकीन दिलाएं, मगर आपको हरगिज़ यकीन न आएगा। लेकिन सच यह है, कि हम दौड़ में एक दूसरे से आगे निकलने में लगे हुए थे कि अचानक यूसुफ को भेड़िया उठाकर ले गया। हमने युसूफ को भेड़िए से छीनने की बहुत कोशिश की लेकिन अब्बा जान हम इस कोशिश में नाकाम रहे। जब तक हम यूसुफ के पास पहुंचे भेड़िया यूसुफ को खा चुका था।

हजरत याक्रूब अलैहि सलाम ने यूसुफ़ के लिबास को देखा तो वह खून से लथपथ था। मगर किसी एक जगह से भी फटा हुआ न था, और न चाक दामां था। हजरत याकूब अलैहिस्सलाम फौरन हकीक़त को भांप गए मगर भड़कने, तान व तकनीम करने और नफ़रत व हकारत का तरीका अपनाये बगैर पैग़म्बराना इल्म व फरासत के साथ यह बता दिया कि तुम अपनी लाख कोशिश के बावजूद हकीकत छिपा न सके।
हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम का किस्सा हिंदी में



कनांन का कुआं और हिजाजी इस्माइलों का काफिला।
इधर यह बातें हो रही थी और शाम का वक्त था उधर हिजाजी स्माइलो का काफिला कनांन के कुए के पास से गुजर रहा था। उस काफिले में से किसी को प्यास लगी और वह पानी पीने के लिए कुएं के पास चल दिया। कुएं में यूसुफ को देखकर उसने जोर से आवाज लगाई और काफिले के लोग कुएं के पास जमा होगा। रस्सी डालकर कुएं में यूसुफ को निकाला गया।
और इस तरह हिजाजी इस्माइलों के काफिले ने यूसुफ को निकालकर अपना गुलाम बना लिया। और तिजारत के माल के साथ उनको भी मिस्र के बाजार ले गए।
हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम को रिवाज के मुताबिक मिस्र के बाजार में बेचने के लिए खड़ा कर दिया।
उसी वक्त उधर से शाही खानदान का एक रईस और मिस्त्री फौजों का अफसर फोतीफार गुजर रहा था। उसने हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम को खरीद लिया और अपने घर ले गया।
फोतीफार नें हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम को बहुत ही इज्जत और एहतराम से अपनी औलाद की तरह रखा। फोतीफार ने अपने मामले और तमाम जिम्मेदारियां उनके सुपुर्द कर दी। हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम के साथ जो हो रहा था यह सब अल्लाह की मर्जी से हो रहा था।
हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम और जुलेखा का किस्सा हिंदी में।
कुएं में डाले जाने और बाजार में युसूफ के बिकने के बाद यीशु वाले सलाम की एक और आजमाइश शुरू हुई। यह समय वह था कि हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम का जवानी का आलम था।
हुस्न और खूबसूरती का कोई ऐसा पहलू ना था जो हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम के अंदर मौजूद ना हो। अजीजे मिस्त्र की बीवी जिसका नाम जुलेखा का था, यूसुफ की खूबसूरती और हुस्न को देखकर अपने आप पर काबू न रख सकी और उन पर फिदा हो गई। मगर न नबूवत के लिए मुखंतब आदमी से भला यह कैसे मुमकिन था, अजीज की बीवी के नापाक इरादों को कैसे पूरा करें।
अजीजे मिस्त्र की बीवी जुलेखा ने हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम को अपने कमरे में बुलाया जिसमें 7 दरवाजे थे। यूसुफ जुलेखा के कमरे में गए तब जुलेखा  ने कमरे के 7 दरवाजे बंद कर दिए। जब यूसुफ के साथ  जुलेखा ने अपने नापाक इरादों को पूरा करने की कोशिश की तब यूसुफ वहां से भाग निकले। और खुदा की कुदरत तो देखें कि जो दरवाजे जुलेखा ने बंद किए थे,वह यूसुफ के लिए खुद ब खुद खुलते चले गए। इतने में अजीजे मिस्त्र वहां आ गया, अजीजे मिश्र को देखकर जुलेखा अपनी बात से पलट गई और यूसुफ को कसूरवार ठहरा दिया।
युसूफ और जुलेखा का यह मामला मिस्र के बादशाह तक पहुंच गया। हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम खाताबार थे या जुलेखा खताबार थी। जुलेखा के रिश्तेदार मैं ही एक मासूम बच्चे ने जिसकी उम्र 4 माह की थी गवाही दी।कि यूसुफ का कुर्ता आगे से फटा तो यूसुफ की खता और अगर कुर्ता पीछे से फटा तो जुलेखा की खता है।

अज़ीजे मिस्र ने  फ़ज़ीहत और रुस्वाई से बचने के लिए इस मामले को यहीं पर ख़त्म कर दिया, मगर बात छिपी न रह सकी। कुरआन मजीद में आता है –

तर्जुमा-और (जब इस मामले का चर्चा फैला) तो शहर की कुछ औरतें कहने लगीं, देखो अजीज की बीवी अपने गुलाम पर डोरे डालने लगी उसे रिझा ले, वह उसकी चाहत में दिल हार गई हमारे ख्याल में तो बदचलनी में पड़ गई। पस जब अजीज़ की बीवी ने इन औरतों की बातों को सुना, तो उनको बुलावा भेजा और उनके लिए मस्नदें तैयार की और (दस्तूर के मुताबिक) हर एक को एक-एक छुरी पेश कर दी, फिर यूसुफ़ से कहा, सबके सामने निकल आओ। जब यूसुफ़ को इन औरतों ने देखा तो बड़ाई की कायल हो गईं, उन्होंने अपने हाथ काट लिए और (बे-अलिया पुकार उठी, यह तो इंसान नहीं, ज़रूर एक फ़रिश्ता है, बड़े रुतबेवाला फ़रिश्ता। (अज़ीज की बीवी) बोली : तुमने देखा, यह है वह आदमी जिस के बारे में तुमने मुझे ताने दिए।”

अज़ीज़ की बीवी ने यह भी कहा कि बेशक मैंने उसका दिल अपने काम में लेना चाहा था, मगर वह बे-काबू न हुआ, मगर मैं कहे देती हूं कि अगर इसने मेरा कहा न माना तो यह होकर रहेगा। कि वह कैद किया जाए और बेइज्जती में पड़े।

हज़रत यूसुफ़ ने जब यह सुना और फिर अजीजे मिस्र की बीवी के अलावा और सब औरतों के चरित्र अपने बारे में देखे तो अल्लाह के हुजर ने हाथ फैलाकर दुआ की और कहने लगे –

तर्जुमा- ‘यूसुफ़ ने कहा, ऐ मेरे पालनहार! जिस बात की तरफ़ ये मुझको बुलाती है, मुझे उसके मुकाबले में कैदखाने में रहना ज़्यादा पसन्द है. और अगर तूने उनके मक्र को मुझसे न हटा दिया और मेरी मदद न की, तो मैं कहीं उनकी ओर झुक न जाऊं और नादानों में से हो जाऊं। बस उनके रब ने उनकी दुआ कुबूल की और उनसे उनका मक्र हटा दिया। बेशक वह सुनने वाला,और जानने वाला है।

अब अजीजे मिस्र ने यूसुफ़ अलैहि सलाम की तमाम निशानियां देखने और समझने के बाद अपनी बीवी की फजीहत व रुसवाई होती देखकर। यह तय कर ही लिया कि यूसुफ को एक मुद्दत के लिए कैदखाने में बन्द कर दिया जाए। ताकि यह मामला लोगों के दिलों से निकल जाए, ये चर्चे बन्द हो जाएं, इस तरह हज़रत यूसुफ अलैहि सलाम को जेल जाना पड़ा।

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