2022 में ग्यारहवीं शरीफ कब है।

2022 में ग्यारहवीं शरीफ कब है


2022 में ग्यारहवीं शरीफ कब है आज जानेंगे हमारे इस आर्टिकल में हम आपको विस्तार से बताने वाले हैं कि 2022 में ग्यारहवीं शरीफ कब है और ग्यारहवीं शरीफ किस लिए मनाया जाता है यह सब आप हमारे इसी आर्टिकल में जानेंगे।

ग्यारहवीं शरीफ मुस्लिम समुदाय के लोगों में सुन्नी समुदाय के लोग होते हैं वह ग्यारहवीं शरीफ को बड़ी ही धूमधाम से मनाते हैं। इस बार 2022 में ग्यारहवीं शरीफ 5 नवंबर दिन शनिवार 2022 को मनाई जाएगी।

ग्यारहवीं शरीफ क्या है और क्यों मनाया जाता है।

ग्यारहवीं शरीफ का त्यौहार मुस्लिम समाज के लोगों में सुन्नी समुदाय के लोग इस त्यौहार को बड़ी ही धूमधम से मनाते हैं। ग्यारहवीं शरीफ का त्यौहार हजरत अब्दुल कादिर जिलानी यानी कि गोसे पाक के सिलसिले और ताल्लुक से मनाया जाता है। हजरत अब्दुल कादिर जिलानी को कई नामों से जाना जाता है। जैसे:- हजरत पीराने पीर दस्तगीर, गौस ए पाक, अब्दुल कादिर जिलानी आदि नामों से गोसे पाक साहब को जाना जाता है।

ऐसा माना जाता है कि गोसे पाक हजरत मोहम्मद उर रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो ताआला अलेही वसल्लम के खानदान से ताल्लुक रखते थे। यह दुनिया में मुस्लिम धर्म को बढ़ाने के लिए आए थे इनको वह आला मुकाम हासिल है जो किसी और को नहीं है। इन्हें वलियों का सरदार कहा जाता है। इसलिए इन्हें पीराने पीर दस्तगीर कहते हैं।


हजरत पीराने पीर दस्तगीर का जन्म 17 मार्च सन 1078 ईस्वी में इरान के गिलान राज्य में हुआ था। रमजान महीने के पहले दिन को उनके जन्मदिन के रूप में माना जाता है। हर साल रबी अल थानी महीने की 11 तारीख को ग्यारहवीं शरीफ मनाई जाती है।


ग्यारहवीं शरीफ का त्यौहार क्यों मनाया जाता है।

ग्यारहवीं शरीफ का त्यौहार क्यों मनाया जाता है, यह जानेंगे आज आप हमारे इस आर्टिकल में। ग्यारहवीं शरीफ का त्यौहार हजरत अब्दुल कादिर जिलानी की याद में मनाया जाता है। हजरत अब्दुल कादिर जिलानी जो अल्लाह के वली है।और इन्हें वलियों में सबसे आला मुकाम हासिल है, इसलिए इन्हें वलियों का सरदार भी कहा जाता है। 

ग्यारहवीं शरीफ हजरत अब्दुल कादिर जिलानी की पुण्यतिथि के रूप में मनाते हैं। जो मेरे प्यारे इस्लामी भाई इस बात को नहीं जानते हैं कि ग्यारहवीं शरीफ का त्यौहार क्यों मनाया जाता है वह हमारे इस आर्टिकल की मदद से जान सकते हैं कि ग्यारहवीं शरीफ का त्यौहार हजरत अब्दुल कादिर जिलानी की याद में रबी अल थानी महीने की 11 तारीख को मनाते हैं।


ग्यारहवीं शरीफ को मनाने का तरीका हिंदी में।

ग्यारहवीं शरीफ के त्यौहार को किस तरह मनाया जाता है। यह तरीका आज हम आपको बहुत ही आसान से शब्दों में बताने वाले हैं। रबी अल थानी महीने की 11 तारीख ग्यारहवीं शरीफ का त्यौहार मनाते हैं। ग्यारहवीं शरीफ का त्यौहार मनाने के लिए हजरत अब्दुल कादिर जिलानी के तरह-तरह के पकवान बनाकर  दुरूद फातिहा कर इसाले सबाब हजरत पीराने पीर दस्तगीर को पहुंचाते हैं। मुस्लिम समाज के लोग ग्यारहवीं शरीफ के त्यौहार को बड़ी ही धूमधाम से मनाते हैं और उनके जिक्र के लिए जलसे का प्रोग्राम मस्जिद और अपने घरों पर करते हैं।

ग्यारहवीं शरीफ के दिन अब्दुल कादिर जिलानी की दरगाह जो कि बगदाद में है वहां पर बहुत ही ज्यादा भीड़ होती है। दूरदराज से उन की दरगाह पर लोग आते हैं।दुरूद फातिहा कराकर और दुआएं मांग कर चले जाते हैं। हजरत अब्दुल कादिर जिलानी की दरगाह पर या उनके नाम लेकर जो भी दुआएं मांगता है, उसकी दुआएं बहुत ही जल्द कुबुल होती हैं। इस दिन मौलाना और मौलवियों के द्वारा आवाम को हजरत अब्दुल कादिर जिलानी के बारे में शिक्षा दी जाती है। मौलाना और मौलवियों के द्वारा यह बताया जाता है कि हजरत अब्दुल कादिर जिलानी मियां कैसे अल्लाह के बताए हुए रास्ते पर चलें और लोगों को उस रास्ते पर चलने की हिदायत दी।

इस दिन लोग मस्जिदों में नमाज अदा करते हैं और हजरत अब्दुल कादिर जिलानी के बताए हुए रास्तों को अपनाकर अल्लाह की बारगाह में हाथ उठाकर दुआएं मांगते हैं।

ग्यारहवीं शरीफ का इतिहास हिंदी में।

ग्यारहवीं शरीफ का इतिहास क्या है ,आज हम आपको हिंदी में बताने वाले हैं।

ग्यारहवीं शरीफ का यह त्यौहार हजरत अब्दुल कादिर जिलानी यानी कि गोसे पाक के सिलसिले से मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घर तरह-तरह के पकवान बनाकर गोसे पाक और अल्लाह के वली और बलियों का जिक्र करते हैं। जब कोई ग्यारहवीं शरीफ के त्यौहार को अपने घर पर बनाता है, तो वह न्याज करता है।लोगों में गरीबों में तक्सीम करता है।मौलाना वह मुफ्ती, मोलवियों के द्वारा मिला-दे-महफिल का प्रोग्राम अपने घर पर करता है। जहां अल्लाह और अल्लाह के वली और नबियों का जिक्र होता है।

अब्दुल कादिर जिलानी का जन्म इस्लामी कैलेंडर के हिसाब से रमजान के पहले दिन 470 हिजरी में हुआ था। हिंदी कैलेंडर के हिसाब से अब्दुल कादिर जिलानी का जन्म 17 मार्च सन 1018 ईस्वी में जिला राज्य में हुआ था, जो आज वर्तमान में ईरान में है।

अब्दुल कादिर जिलानी के पिता का नाम शेख अबु मूसा सालेह था। इनकी माता का नाम सैयदा बीबी उम्मीद खैर फातिमा था। अब्दुल कादिर जिलानी है अपनी प्रारंभिक शिक्षा हनबाली विद्यालय से प्राप्त की थी। जोकि सुननी शिक्षा का प्रमुख केंद्र था।


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